Deepavali Puja

Deepavali Puja

भूमिका –   भारत एक परंपराओ का देश है। नैतिक सामाजिक राजनैतिक ही नही वरन विज्ञान शिक्षा की भी भारत में एक स्वस्थ परंपरा रही हैं। भारतीय समाज का वैज्ञानिक चितंन एंवम दृष्टिकोण उसके स्थापत्य, कला, संगीत, लोक व्यवहार, खान पान, वेष भूषा आदी सभी क्षेत्रो से प्रकट होता है। भारत की लोक परंपरा अत्यंत समृद्ध  रही है। लोक आकृतियां , लोक परंपराओ का प्रमुख अंग है  इनमें हम रंगोली से अच्छी तरह परिचित है ये कला के साथ साथ गणितिय आकृतियो का अदभूत संगम है। दीपावली  सभी वर्ग के लोगो के लिए एक दैविक ,भौतिक आध्यात्मिक  पर्व है ..

संस्कृति के इतने रंग हमें किसी और संस्कृति में दिखलाइ  नहीं पड़ते

दीपावली हमारा सबसे प्राचीन धार्मिक पर्व है। यह पर्व प्रतिवर्ष कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है। देश-विदेश में यह बड़ी श्रद्धा, विश्वास एवं समर्पित भावना के साथ मनाया जाता है। यह पर्व ‘प्रकाश-पर्व’ के रूप में मनाया जाता है। इस पर्व के साथ अनेक धार्मिक, पौराणिक एवं ऐतिहासिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। मुख्यतया: यह पर्व लंकापति रावण पर विजय हासिल करके और अपना चौदह वर्ष का वनवास पूरा करके अपने घर आयोध्या लौटने की खुशी में मनाया जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार जब श्रीराम अपनी पत्नी सीता व छोटे भाई लक्ष्मण सहित आयोध्या में वापिस लौटे थे तो नगरवासियों ने घर-घर दीप जलाकर खुशियां मनाईं थीं। इसी पौराणिक मान्यतानुसार प्रतिवर्ष घर-घर घी के दीये जलाए जाते हैं और खुशियां मनाई जाती हैं।

दीपावली पर्व से कई अन्य मान्यताएं, धारणाएं एवं ऐतिहासिक घटनाएं भी जुड़ी हुई हैं। कठोपनिषद् में यम-नचिकेता का प्रसंग आता है। इस प्रसंगानुसार नचिकेता जन्म-मरण का रहस्य यमराज से जानने के बाद यमलोक से वापिस मृत्युलोक में लौटे थे। एक धारणा के अनुसार नचिकेता के मृत्यु पर अमरता के विजय का ज्ञान लेकर लौटने की खुशी में भू-लोकवासियों ने घी के दीप जलाए थे। किवदन्ती है कि यही आर्यवर्त की पहली दीपावली थी।

एक अन्य पौराणिक घटना के अनुसार इसी दिन श्री लक्ष्मी जी का समुन्द्र-मन्थन से आविर्भाव हुआ था। इस पौराणिक प्रसंगानुसार ऋषि दुर्वासा द्वारा देवराज इन्द्र को दिए गए शाप के कारण श्री लक्ष्मी जी को समुद्र में जाकर समाना पड़ा था। लक्ष्मी जी के बिना देवगण बलहीन व श्रीहीन हो गए। इस परिस्थिति का फायदा उठाकर असुर सुरों पर हावी हो गए। देवगणों की याचना पर भगवान विष्णु ने योजनाबद्ध ढ़ंग से सुरों व असुरों के हाथों समुद्र-मन्थन करवाया। समुन्द्र-मन्थन से अमृत सहित चौदह रत्नों में श्री लक्ष्मी जी भी निकलीं, जिसे श्री विष्णु ने ग्रहण किया। श्री लक्ष्मी जी के पुनार्विभाव से देवगणों में बल व श्री का संचार हुआ और उन्होंने पुन: असुरों पर विजय प्राप्त की। लक्ष्मी जी के इसी पुनार्विभाव की खुशी में समस्त लोकों में दीप प्रज्जवलित करके खुशियां मनाईं गई। इसी मान्यतानुसार प्रतिवर्ष दीपावली को श्री लक्ष्मी जी की पूजा-अर्चना की जाती है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार समृद्धि की देवी श्री लक्ष्मी जी की पूजा सर्वप्रथम नारायण ने स्वर्ग में की। इसके बाद श्री लक्ष्मी जी की पूजा दूसरी बार, ब्रह्मा जी ने, तीसरी बार शिव जी ने, चौथी बार समुन्द्र मन्थन के समय विष्णु जी ने, पांचवी बार मनु ने और छठी बार नागों ने की थी।

दीपावली पर्व के सन्दर्भ मे एक पौराणिक प्रसंग भगवान श्रीकृष्ण भी प्रचलित है। इस प्रसंग के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण बाल्यावस्था मे पहली बार गाय चराने के लिए वन में गए थे। संयोगवश इसी दिन श्रीकृष्ण ने इस मृत्युलोक से प्रस्थान किया था। एक अन्य प्रसंगानुसार इसी दिन श्रीकृष्ण ने नरकासुर नामक नीच असुर का वध करके उसके द्वारा बंदी बनाई गई देव, मानव और गन्धर्वों की सोलह हजार कन्याओं को मुक्ति दिलाई थी। इसी खुशी में लोगों ने दीप जलाए थे, जोकि बाद मे एक परंपरा में परिवर्तित हो गई।

दीपावली के पावन पर्व से भगवान विष्णु के वामन अवतार की लीला भी जुड़ी हुई है। एक समय दैत्यराज बलि ने परम तपस्वी गुरू शुक्राचार्य के सहयोग से देवलोक के राजा इन्द्र को परास्त करके स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। समय आने पर भगवान विष्णु ने अदिति के गर्भ से महर्षि कश्यप के घर वामन के रूप में अवतार लिया। जब राजा बलि भृगकच्छ नामक स्थान पर अश्वमेघ यज्ञ कर रहे थे तो भगवान वामन ब्राहा्रण वेश मे राजा बलि के यज्ञ मण्डल में जा पहुंचे। बलि ने वामन से इच्छित दान मांगने का आग्रह किया। वामन ने बलि से संकल्प लेने के बाद तीन पग भूमि मांगी। संकल्पबद्ध राजा बलि ने ब्राहा्रण वेशधारी भगवान वामन को तीन पग भूमि नापने के लिए अनुमति दे दी। तब भगवान वामन ने पहले पग में समस्त भूमण्डल और दूसरे पग में त्रिलोक को नाप डाला। तीसरे पग में बलि ने विवश होकर अपने सिर को आगे बढ़ाना पड़ा। बलि की इस दान वीरता से भगवान वामन प्रसन्न हुए। उन्होंने बलि को सुतल लोक का राजा बना दिया और इन्द्र को पुन: स्वर्ग का स्वामी बना दिया। देवगणों ने इस अवसर पर दीप प्रज्जवलित करके खुशियां मनाई और पृथ्वीलोक में भी भगवान वामन की इस लीला के लिए दीप मालाएं प्रज्जवलित कीं।

दीपावली के दीपों के सन्दर्भ में देवी पुराण का एक महत्वपूर्ण प्रसंग भी जुड़ा हुआ है। इसी दिन दुर्गा मातेश्वरी ने महाकाली का रूप धारण किया था और असंख्य असुरों सहित चण्ड और मुण्ड को मौत के घाट उतारा था। मृत्युलोक से असुरों का विनाश करते-करते महाकाली अपना विवके खो बैठीं और क्रोध में उसने देवों का भी सफाया करना शुरू कर दिया। देवताओं की याचना पर शिव महाकाली के समक्ष प्रस्तुत हुए। क्रोधावश महाकाली शिव के सीने पर भी चढ़ बैठीं। लेकिन, शिव-’शरीर का स्पर्श पाते ही उसका क्रोध शांत हो गया। किवदन्ती है कि तब दीपोत्सव मनाकर देवों ने अपनी खुशी का प्रकटीकरण किया।

दीपावली पर्व के साथ धार्मिक व पौराणिक मान्यताओं के साथ-साथ कुछ ऐतिहासिक घटनाएं भी जुड़ी हुई हैं। एक ऐतिहासिक घटना के अनुसार गुप्तवंश के प्रसिद्ध सम्राट विक्रमादित्य के राज्याभिषेक के समय पूरे राज्य में दीपोत्सव मनाकर प्रजा ने अपने भावों की अभिव्यक्ति की थी। इसके अलावा इसी दिन राजा विक्रमादित्य ने अपना संवत चलाने का निर्णय किया था। उन्होंने विद्वानों को बुलवाकर निर्णय किया था कि नया संवत चैत्र सुदी प्रतिपदा से ही चलाया जाए।

दीपावली के दिन ही महान समाज सुधारक, आर्य समाज के संस्थापक और ‘सत्यार्थ-प्रकाश’ के रचियता महर्षि दयानंद सरस्वती की महान् आत्मा ने ३० अक्तूबर, १८८३ को अपने नश्वर शरीर को त्यागकर निर्वाण प्राप्त किया था। परम संत स्वामी रामतीर्थ का जन्म इसी दिन यानी कार्तिक मास की अमावस्या के दिन ही हुआ था और उनका देह त्याग भी इसी दिन होने का अनूठा उदाहरण भी हमें मिलता है। इस प्रकार स्वामी रामतीर्थ के जन्म और निर्वाण दोनों दिवसों के रूप में दीपावली विशेष महत्व रखती है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

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ज्ञानेनैवापरे विप्राः यजन्ते तैर्मखःसदा।

ज्ञानमूलां क्रियामेषा पश्चन्तो ज्ञानचक्षुषा।।

       हिन्दी में भावार्थकुछ गृहस्थ विद्वान अपनी क्रियाओं को अपने ज्ञान नेत्रों से देखते हैं। अपने कार्य को ज्ञान से संपन्न करना  भी एक तरह से यज्ञानुष्ठान है।  वह ज्ञान को महत्वपूर्ण मानते हैं इसलिये उन्हें श्रेष्ठ माना जाता है।

ब्राह्मो मुहूर्ते बुध्येत धर्मार्थो चानुचिन्तयेत्।

कायक्लेशांश्च तन्मूलान्वेदातत्तवार्थमेव च।।

      हिन्दी में भावार्थब्रह्म मुहूर्त में उठकर धर्म का अनुष्ठान करने के बाद अर्थोपार्जन का विचार करना चाहिए।  इस शुभ मुहूर्त में शारीरिक क्लेशों को दूर करने के साथ ही वेदों के ज्ञान पर विचार करना भी उत्तम रहता है।

लक्ष्मी दो प्रकार से आती हैं – एक गरुड़ वाहनी जो भगवान विष्णु के साथ आती हैं। यह सद्कर्म से अर्जित की गई लक्ष्मी के रूप में आती हैं। इस लक्ष्मी के आने पर व्यक्ति के कार्य, व्यवहार, आचरण में कहीं कोई कमी नहीं झलकती है बल्कि वह विनम्रता से संपन्न होकर समाजसेवी, परोपकारी, दरिद्र नारायण की सेवा करने वाला होता है। उसकी लोकप्रियता समाज-देश में बढ़ती ही चली जाती है। इसके विपरीत उल्लू वाहिनी लक्ष्मी का आगमन अनैतिक कर्म के द्वारा होता है।

उसके आने के साथ ही उल्लू का आगमन भी घर में हो जाता है। फलस्वरूप उस व्यक्ति में तामसी प्रवृत्ति वाले दुगरुण भी आते हैं। जिस प्रकार उल्लू रात में जागता है एवं दिन में सोता है, ठीक उसी प्रकार वह भी देर से उठने एवं देर रात तक कार्य करने में प्रवृत्त हो जाता है। ऐसे जातकों की संतान भी संस्कार विहीन हो जाती है। वैसे भी शास्त्रों में कहा गया है कि अनैतिकता से प्राप्त की गई सफलता व समृद्धि लंबे समय तक साथ नहीं देती है।
लक्ष्मी की परिभाषा में आमजन केवल धन को ही मानते हैं जबकि लक्ष्मी आठ प्रकार की होती हैं – आद्य लक्ष्मी, विद्या लक्ष्मी, सौभाग्य लक्ष्मी, अमृत लक्ष्मी, काम लक्ष्मी, सत्य लक्ष्मी, भोग लक्ष्मी, योग लक्ष्मी। जैसा कि नाम से ही अर्थ स्पष्ट हो रहा है। ये सभी लक्षण लक्ष्मीवान के होते हैं अर्थात उपरोक्त में से एक भी लक्ष्मी व्यक्ति को समर्थ एवं सुखी बना सकती है।
अत: व्यक्ति को धन की चाह के बजाय आदर्श परिवार की ओर उन्मुख होना चाहिए ताकि जीवन में सभी सुख मिल सकें और वह उनका उपभोग भी कर सके। लक्ष्मी जी ने स्वयं कहा है – सत्य, दान, व्रत, तप, धर्म, पराक्रमी, सरल व्यक्ति के यहां मैं निवास करती हूं तथा जहां आलस्य, निद्रा, असंतोष, अधर्मी, संतान का पालन विधिवत न हो रहा हो, उस स्थान को मैं छोड़ देती हूं।
लक्ष्मी पानी की भांति चंचल होती हैं। फिर भी लक्ष्मी को स्थायी रूप से रोकने के लिए स्थायी प्रयास प्रतिवर्ष करने पड़ते हैं। दीपावली के दिन लक्ष्मीजी की पूजा विधि-विधान से करनी चाहिए। शुभ मुहुर्त में एक कंबल के आसन पर बैठ कर सम्मुख पाटे पर पीले या लाल वस्त्र पर पीले चावल रखकर उस पर श्रीयंत्र की स्थापना करें। दीपक, अगरबत्ती, धूपबत्ती जलाएं, मन में श्रद्धापूर्वक मां लक्ष्मी का ध्यान करें।
आह्वान हेतु चावल चढ़ाएं, फिर श्रीयंत्र को जल से उसके बाद पंचामृत से, पुन: जल से स्नान कराएं। पुन: पटिए पर स्थापित करें। केसर, चंदन, कंकू, अबीर, गुलाल, हल्दी, मेहंदी, सिंदूर, अक्षत, फूल, वस्त्र, सेंट, दूर्वा, धूप, दीप, बेसन की मिठाई, फल, सूखा मेवा, लोंग, इलायची, दक्षिणा भेंट करें।

पश्चात निम्न मंत्र की तीन माला का जाप करें।
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धन धान्याधिपतये धन धान्य मे समृद्धि देहि दापय स्वाहा:

जाप पूर्ण होने पर जल छोड़ें, दीपक, कपूर से आरती करें। आरती लें, प्रणाम करें एवं प्रार्थना करें कि हे माता आप कुबेर के खजाने ऋषि-सिद्धि सहित यहां विराजमान रहें। श्रीयंत्र को स्नान कराया हुआ जल अपने घर-कार्यालय और प्रतिष्ठान में छिड़कें

श्रीसूक्त लक्ष्मीपूजन – प्रथम पूजा

श्रीसूक्त के १६ मन्त्र मॉं लक्ष्मी को विशेष प्रसन्न करने वाले माने गए हैं । यह सूक्त ‘ श्री ’ अर्थात लक्ष्मी प्रदान करने वाला है । इसी कारण इसे श्रीसूक्त कहते हैं । वेदोक्त होने के कारण यह अत्यधिक प्रभावशाली भी है । प्रत्येक धार्मिक कार्य में , हवनादि के अन्त में इन १६ सूक्तों से मॉं लक्ष्मी के प्रसन्नार्थ आहूतियॉं अवश्य लगाई जाती हैं । इसके १६ सूक्तों से मॉं लक्ष्मी की षोडशोपचार पूजा की जाती है । दीपावली पर पुराणोक्त , वेदोक्त अथवा पारम्परिक रुप से तो प्रतिवर्ष ही आप पूजन करते हैं । इस वर्ष इन विशिष्ट सूक्तों से मॉं लक्ष्मी को प्रसन्न कीजिए ।

लक्ष्मी पूजन हेतु सामग्री

रोली , मौली , पान , सुपारी , अक्षत ( साबुत चावल ), धूप , घी का दीपक , तेल का दीपक , खील , बतासे , श्रीयंत्र , शंख ( दक्षिणावर्ती हो , तो उत्तम ), घंटी , घिसा हुआ चन्दन , जलपात्र , कलश , पाना ( लक्ष्मी , गणेश एवं सरस्वती का संयुक्त चित्र ), दूध , दही , शहद , शर्करा , घृत , गंगाजल , सिन्दूर , नैवेद्य , इत्र , यज्ञोपवीत , श्वेतार्क के पुष्प , कमल का पुष्प , वस्त्र , कुंकुम , पुष्पमाला , ऋतुफल , कर्पूर , नारियल , इलायची , दूर्वा , एकाक्षी नारियल , चॉंदी का वर्क इत्यादि ।

पूजन विधि

सर्वप्रथम लक्ष्मी -गणेश के पाने ( चित्र ), श्रीयन्त्र आदि को जल से पवित्र करके लाल वस्त्र से आच्छादित चौकी पर स्थापित करें । लाल कम्बल या ऊन के आसन को बिछाकर पूर्वाभिमुख या उत्तराभिमुख बैठें । पूजन सामग्री निम्नलिखित प्रकार से रखें :

बायीं ओर :

१ . जल से भरा हुआ पात्र , २ . घंटी , ३ . धूपदान , ४ . तेल का दीपक ।

दायीं ओर :

१ . घृत का दीपक , २ . जल से भरा शंख ( दक्षिणावर्ती शंख हो , तो उत्तम ) ।

सामने :

१ . घिसा हुआ चन्दन , २ . रोली , ३ . मौली , ४ . पुष्प , ५ . अक्षत आदि ।

भगवान के सामने : चौकी पर नैवेद्य ।

सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्र से अपने ऊपर तथा पूजन सामग्री के ऊपर जल छिडकें :

अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा

यः स्मरेत पुण्डरीकाक्षं बाह्याभ्यन्तरः शुचिः

अब चौकी के दायीं ओर घी का दीपक प्रज्वलित करें ।

स्वस्तिवाचन

इसके पश्चात दाहिने हाथ में अक्षत और पुष्प लेकर निम्न मन्त्रों से स्वस्तिवाचन करें :

स्वस्ति इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः

स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु

पयः पृथिव्यां पय ओषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः

पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम

विष्णो रराटमसि विष्णोः श्नप्त्रेस्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोर्ध्रुवोऽसि वैष्णवमसि विष्णवे त्वा

अग्निर्देवताव्वातोदेवतासूर्य्योदेवता चन्द्रमा देवताव्वसवो देवता रुद्रोदेवता आदित्यादेवता मरुतोदेवता विश्वेदेवा देवता बृहस्पतिः देवतेन्द्रोदेवताव्वरुणोदेवता

द्यौः शान्तिरन्तिरिक्ष शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः

वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि

यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु

शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः सुशान्तिर्भवतु

शांतिः शांतिः सुशांतिर्भवतु सर्वारिष्टशांतिर्भवतु

अब हाथ में लिए हुए अक्षत -पुष्य सामने चौकी पर चढा दें ।

गणपति आदि देवताओं का स्मरण

स्वस्तिवाचन के पश्चात निम्नलिखित मन्त्र के साथ भगवान गणेश का हाथ में पुष्प -अक्षत आदि लेकर स्मरण करना चाहिए तत्पश्चात उन्हें चौकी पर चढा दें :

सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः

लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो विनायकः

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः

द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि

अब निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए सम्बन्धित देवताओं का का स्मरण करें :

श्रीमन्महागणाधिपतये नमः लक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः

उमामहेश्वराभ्यां नमः वाणीहिरण्यगर्भाभ्यां नमः

शची –पुरन्दराभ्यां नमः मातृपितृचरणकमलेभ्यो नमः

इष्टदेवताभ्यो नमः कुलदेवताभ्यो नमः

ग्राम देवताभ्यो नमः वास्तुदेवताभ्यो नमः

स्थानदेवताभ्यो नमः सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः

सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः सिद्धिबुद्धि सहिताय श्रीमन्महागणाधिपतये नमः

विभिन्न देवताओं के स्मरण के पश्चात निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए गणपति , सूर्य , ब्रह्मा , विष्णु , महेश , सरस्वती इत्यादि को प्रणाम करना चाहिए ।

विनायकं गुरुं भानुं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान

सरस्वतीं प्रणम्यादौ सर्वकार्यार्थ सिद्धये

हाथ में लिए हुए अक्षत और पुष्पों को चौकी पर समर्पित कर दें ।

श्रीसूक्त लक्ष्मीपूजन – द्वितीय पूजा

गणपति स्थापना

अब एक सुपारी लेकर उस पर मौली लपेटकर चौकी पर थोडे से चावल रखकर सुपारी को उस पर रख दें । तदुपरान्त भगवान गणेश का आवाहन करें :

गणानां त्वा गणपति हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपति हवामहे निधीनां त्वा निधिपति हवामहे वसो मम

आहमजानि गर्भधमा त्वमजासि गर्भधम

भूर्भुवः स्वः सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः , गणपतिमावाहयामि , स्थापयामि , पूजयामि

आवाहन के पश्चात निम्नलिखित मन्त्र की सहायता से गणेशजी की प्रतिष्ठा करें और उन्हें आसन दें :

अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु

अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति कश्चन

गजाननं ! सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम

प्रतिष्ठापूर्वकम आसनार्थे अक्षतान समर्पयामि गजाननाभ्यां नमः

पुनः अक्षत लेकर गणेशजी के दाहिनी ओर माता अम्बिका का आवाहन करें :

अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके मा नयति कश्चन

ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम

हेमाद्रितनयां देवीं वरदां शमरप्रियाम

लम्बोदरस्य जननीं गौरीमावाहयाम्यहम

भूभुर्वःस्वः गौर्ये नमः , गौरीमावाहयामि , स्थापयामि , पूजयामि

अक्षत चौकी पर छोड दें । अब पुनः अक्षत लेकर माता अम्बिका की प्रतिष्ठा करें :

अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु

अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति कश्चन

अम्बिके सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम

प्रतिष्ठापूर्वकम आसनार्थे अक्षतान समर्पयामि गणेशाम्बिकाभ्यां नमः  ऐसा कहते हुए आसन पर अक्षत समर्पित करें ।

संकल्प

उपर्युक्त प्रक्रिया के पश्चात दाहिने हाथ में अक्षत , पुष्प , दूर्वा , सुपारी , जल एवं दक्षिणा ( सिक्का ) लेकर निम्नलिखित प्रकार से संकल्प करें :

विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य ब्रह्मणोऽह्रि द्वितीयपरार्धे श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवस्वतमन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलिप्रथमचरणे जम्बूद्वीपे भारतवर्षे आर्यावर्तैकदेशेनगरे /ग्रामे /क्षेत्रे २०६७ वैक्रमाब्दे शोभननाम संवत्सरे कार्तिक मासे कृष्णपक्षे अमावस्यायां तिथौ शुक्रवासरे प्रदोषकाले /सायंकाले /रात्रिकाले स्थिरलग्ने शुभ मुहूर्तेगोत्र उत्पन्नःशर्मा /वर्मा /गुप्तः अहं श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त फलवाप्तिकामनया ज्ञाताज्ञातकायिक वाचिक मानसिक सकल पाप निवृत्तिपूर्वकं मम सर्वापच्छान्तिपूर्वक दीर्घायुष्यबल पुष्टिनैरुज्यादि सकलशुभफल प्राप्तर्थं गज तुरंगरथराज्यैश्वर्यादि सकल सम्पदाम उत्तरोत्तराभिवृदध्यर्थं विपुल धनधान्यप्राप्त्यर्थे , मम सपुत्रस्य सबांधवस्य अखिलकुटुम्बसहितस्य समस्त भय व्याधि जरा पीडा मृत्यु परिहारेण , आयुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं परमंत्र परतंत्र परयंत्र परकृत्याप्रयोग छेदनार्थं गृहे सुखशांति प्राप्तर्थं मम जन्मकुण्डल्यां , गोचरकुण्डल्यां , दशाविंशोत्तरी कृत सर्वकुयोग निवारणार्थं मम जन्मराशेः अखिल कुटुम्बस्य वा जन्मराशेः सकाशाद्ये केचिद्विरुद्ध चतुर्थाष्टम द्वादश स्थान स्थित क्रूर ग्रहास्तैः सूचितं सूचयिष्यमाणं यत्सर्वारिष्ट तद्विनाशाय नवम एकादश स्थान स्थित ग्रहाणां शुभफलप्राप्त्यर्थं आदित्यादि नवग्रहानुकूलता सिद्धयर्थं दैहिक दैविक भौतिक तापत्रय शमनार्थम धर्मार्थकाम मोक्ष फलवाप्त्यर्थं श्रीमहालक्ष्मीपूजनं कुबेरादीनां पूजनं करिष्ये तदड्रत्वेन प्रथमं गणपत्यादिपूजनं करिष्ये

उक्त संकल्प वाक्य पढकर जलाक्षतादि गणेशजी के समीप छोड दें । इसके पश्चात गणेशजी का पूजन करें ।

गणेशाम्बिका पूजन

हाथ में अक्षत लेकर निम्न मन्त्र से गणेशाम्बिका का ध्यान करें :

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्बूफलचारुभक्षणम

उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपमजम

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः

नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम

श्रीगणेशाम्बिकाभ्यां नमः कहकर हाथ में लिए हुए अक्षतों को भगवान गणेश एवं माता गौरी को समर्पित करें ।

गणपति और गौरीकी पूजा

 (पूजामें जो वस्तु विद्यमान न हो उसके लिये ‘मनसा परिकल्प्य समर्पयामिकहे  जैसे, आभूषणोके लिये ‘आभूषणं मनसा परिकल्प्य समर्पयामि।)

हाथमें अक्षत लेकर ध्यान करे-

भगवान गणेशका ध्यान-

गजाननं भूतगणादिसेवितं कपित्थजम्भूफलचारुभक्षणम्

उमासुतं शोकविनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपङ्कजम्

भगवती गौरीका ध्यान –

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः

नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्

श्रीगणेशाम्बिकाभ्यां नमः, ध्यानं समर्पयामि

भगवान गणेशका आवाहन-

गणानां त्वा गणपतिहवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिहवामहे निधीनां त्वा निधिपतिहवामहे वसो मम

आहमजानि गर्भधमात्वमजासि गर्भधम्

एह्येहि हेरम्ब महेशपुत्र समस्तविघ्नौघविनाशदक्ष

माङ्गल्यपूजाप्रथमप्रधान गृहाण पूजां भगवन् नमस्ते

भूर्भुवः स्वः सिद्धिबुद्धिसहिताय गणपतये नमः, गणपतिमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि

हाथके अक्षत गणेशजीपर चढ़ा दे । फिर अक्षत लेकर गणेशजीकी दाहिनी ओर गौरीजीका आवाहन करे ।

भगवती गौरी का आवाहन-

अम्बे अम्बिकेऽम्बालिके मा नयति कश्चन

ससस्त्यश्‍वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्

हिमाद्रितनयां देवीं वरदां शङ्करप्रियाम्

लम्बोदरस्य जननीं गौरीमावाहयाम्यहम्

भूर्भुवः स्वः गौर्यै नमः, गौरिमावाहयामि, स्थापयामि, पूजयामि

प्रतिष्ठा –

मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञसमिमं दधातु

विश्‍वे देवास इह आदयन्ताम् प्रतिष्ठ

अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु

अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति कश्चन

गणेशाम्बिके! सुप्रतिष्ठिते वरदे भवेताम्

प्रतिष्ठापूर्वकम् आसनार्थे अक्षतान् समर्पयामि गणेशाम्बिकाभ्यां नमः

(आसनके लिये अक्षत समर्पित करे) ।

पाद्य, अर्घ्य, आचमनीय, स्नानीय, पुनराचमनीय

देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां स्नानीय, पूष्णो हस्ताभ्याम्

एतानि पाद्यार्घ्याचमनीयस्नानीयपुनराचमनीयानि समर्पयामि गणेशाम्बिकाभ्यां नमः

(इतना कहकर जल चढ़ा दे) ।

दुग्धस्नान –

पयः पृथ्वियां पय औषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयो धाः

पयस्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम्

कामधेनुसमुद्भूतं सर्वेषां जीवनं परमं

पावनं यज्ञहेतुश् पयः स्नानार्थमर्पितम्

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः पयः स्नानं समर्पयामि

(दूधसे स्नान कराये) ।

दधिस्नान –

दधिक्राव्णो अकारिषं जिष्णोरश्वस्य वाजिनः

सुरभि नो मुखाकरत्प्राण आयूषि तारिषत्

पयसस्तु समुद्भूतं मधुराम्लं शशिप्रभम्

दध्यानीतं मया देव स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्

भुर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः

दधिस्नानं समर्पयामि

(दधिसे स्नान कराये) ।

घृतस्नान –

घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनिर्घृते श्रियो घृतम्वस्य धाम

अनुष्वधमावह मादयस्व स्वाहाकृतं वृषभ वक्षि हव्यम्

नवनीतसमुत्पन्नं सर्वसंतोषकारकम्

घृतं तुभ्यं प्रदास्यामि स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्

भुर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यांनमः घृत स्नानं समर्पयामि

(घृतसे स्नान करये) ।

मधु स्नान

मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः

माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः मधु नक्तमुतोषसो

मधुमत्पार्थिवरजः मधु द्यौरस्तु नः पिता

पुष्परेणुसमुद्भूतं सुस्वादु मधुरं मधु

तेजः पुष्टिकरं दिव्यं स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, मधुस्नानं समर्पयामि

(मधुसे स्नान कराये )।

शर्करा स्नान

अपारसमुद्वयससूर्यै सन्तसमाहितम्

अपारसस्य यो रसस्तं वो गृह्णाम्युत्तममुपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वा जुष्टं गृह्णाम्येष ते योनिरिन्द्राय त्वा जुष्टतमम्

इक्षुरससमुद्भूतां शर्करां पुष्टिदां शुभाम्

मलापहारिकां द्विव्यां स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः शर्करास्नानं समर्पयामि

(शर्करासे स्नान कराये ) ।

पंचामृत स्नान

पञ्चनद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्त्रोतसः

सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेभवत्सरित्

पञ्चामृतं मयानीतं पयो दधि घृतं मधु

शर्करया समायुक्तं स्नानर्थं प्रतिगृह्यताम्

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः

पञ्चामृतस्नानं समर्पयामि

(पंचामृतसे स्नान कराये) ।

गन्धोदक स्नान

अऽऽशुना ते अऽऽशुः पृच्यतां परुषा परुः

गन्धस्ते सोमामवतु मदाय रसो अच्युतः

मलयाचलसम्भूतचन्दनेन विनिःसृतम्

इदं गन्धोदकस्नानं कुङ्कुम्युक्तं गृह्यताम्

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः,

गन्धोदकस्नानं समर्पयामि

(गन्धोदकसे स्नान कराये ।)

शुद्धोदक स्नान –

शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त आश्विनाः

श्येतः श्येताक्षोऽरुणस्ते रुद्राय पशुपतये कर्णा यामा अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपाः पार्जन्याः

गङ्गा यमुना चैव गोदावरी सरस्वती

नर्मदा सिन्धु कावेरी स्नानार्थं प्रतिगृह्यताम्

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः

शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि

(शुद्ध जलसे स्नान कराये ।)

आचमन – शुद्धोदकस्नानान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि

(आचमनके लिये जल दे।)

वस्त्र –

युवा सुवासाः परिवीत आगात् श्रेयान् भवति जायमानः

तं धीराः कवय उन्नयन्ति स्वाध्यो३मनसा देवयन्तः

शीतवातोष्णसंत्राणं लज्जाया रक्षणं परम्

देहालङ्करणं वस्त्रमतः शान्तिं प्रयच्छ मे

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः वस्त्रं समर्पयामि

आचमन – वस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि

(आचमनके लिये जल दे ।)

उपवस्त्र –

सुजातो ज्योतिषा सहशर्म वरूथमाऽसदत्स्वः

वासो अग्ने विश्वरूपथसं व्ययस्व विभावसो

यस्याभावेन शास्त्रोक्तं कर्म किञ्चिन्न सिध्यति

उपवस्त्रं प्रयच्छामि सर्वकर्मोपकारकम

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, उपवस्त्रं (उपवस्त्राभावे रक्तसूत्रम् समर्पयामि ।)

(उपवस्त्र समर्पित करे ।)

आचमन – उपवस्त्रान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि

(आचमनके लिये जल दे ।)

यज्ञोपवीत

यज्ञोपवीतम् परमं पवित्रं प्रजापतेर्येत्सहजं पुरस्तात्

आयुष्यमग्रयं प्रतिमुञ्च शुभ्रं यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः

यज्ञोपवीतमसि यज्ञस्य त्वा यज्ञोपवीतेनोपनह्यामि

नवभिस्तन्तुभिर्युक्तं त्रिगुणं देवतामयम्

यज्ञोपवीतं मया दत्तं गृहाण परमेश्वर

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि

(यज्ञोपवीत समर्पित करें ।)

आचमन – यज्ञोपवीतान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि

(आचमनके लिये जल दे ।)

चंदन

त्वां गन्धर्वा अखनॅंस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः

त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यक्ष्मादमुच्यत्

श्रीखण्डं चंदनं दिव्यं गन्धढ्यं सुमनोहरम्

विलेपनं सुरश्रेष्ठं! चन्दनं प्रतिगृह्यताम्

भुर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः

चन्दनानुलेपनं समर्पयामि

(चंदन अर्पित करे ।)

अक्षत

अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया अधूषत

अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठाअ मती योजान्विन्द्र ते हरी

अक्षताश्‍ सुरश्रेष्ठ कुङ्कुम्युक्ताः सुशोभिताः

मया निवेदिता भक्त्या गृहाण परमेश्वर

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, अक्षतान् समर्पयामि

(अक्षत चढ़ाये ।)

पुष्पमाला

औषधीः प्रति मोदध्वं पुष्पवतीः प्रसूवरीः

अश्‍वा इव सजित्वरीर्वीरुधः पारयिष्णवः

माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनि वै प्रभो

मयाह्रतानि पुष्पाणि पूजार्थ प्रतिगृह्यताम्

भुर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, पुष्पमालां समर्पयामि

(पुष्पमाला समर्पित करे ।)

दूर्वा

काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि

एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्रेण शतेन

दूर्वाङ्कुरान् सुहरितानमृतान् मङ्गलप्रदान्

आनीतांस्तव पूजार्थं गृहाण गणनायक

भुर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, दूर्वाङ्कुरान् समर्पयामि

(दूर्वाङ्कुर चढाये ।)

सिन्दूर

सिन्धोरिव प्राध्वेन शूघनासो वातप्रमियः पतयन्ति यह्वाः

घृतस्य धारा अरुषो वाजी काष्ठा भिन्दन्नूर्मिभिः पिन्वामान्‌ ॥

सिन्दूर शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम्

सुभदं कामदं चैव सिन्दूर प्रतिगृह्यताम्

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः सिन्दूर समर्पयामि

(सिन्दुर अर्पित करे ।)

अबीर गुलाल आदि नाना परिमल द्रव्य –

अहिरिव भोगैः पर्येति बाहुं ज्याया हेतिं परिबाधमानः

हस्तघ्नो विश्वा वयुनानि विद्वान् पुमान् पुमासं परिपातु विश्वतः

अबीरं गुलालं हरिद्रादिसमन्वितम्

नाना परिमलं द्रव्यं गृहाण परमेश्वर

भुर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, नानापरिमलद्रव्याणि समर्पयामि

(अबीर आदि चढ़ाये ।)

सुगन्धिद्रव्य

सुगन्धित द्रव्य अर्पित करते समय निम्न मंत्र का उच्चारण करें ।

दिव्यगन्धसमायुक्तं महापरिमलाद्भुतम्

गन्धद्रव्यमिदं भक्त्या दत्तं वै परिगह्यताम्

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, सुगन्धिद्रव्यं समर्पयामि

(सुगन्धित द्रव्य अर्पण करे ।)

धूप –

धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योऽस्मान् धूर्वति

तं धूर्व यं वयं धूर्वामिः

देवानामसि वह्नितमसस्नितमं पप्रितं जुष्टतमं देवहूतमम्

वनस्पतिरसोद्‌भूतो गन्धाढ्यो गन्ध उत्तमः

आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम्

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, धूपमाघ्रापयामि

(धूप दिखाये ।)

दीप –

अग्निर्न्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्य स्वाहा

अग्निर्वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा

सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा

ज्योति सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा

साज्यं चं वर्तिसंयुक्तं वह्निना योजितं मया

दीपं गृहाण देवेश त्रैलोक्यतिमिरापहम्

भक्त्या दीपं प्रयच्छामि देवाय परमात्मने

त्राहि मां निरयाद् घोराद् दीपज्योतिर्नमोऽस्तुते

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, दीपं दर्शयामि

(दीप दिखाये ।)

हस्तप्रक्षालन – ह्रषिकेशाय नमः कहकर हाथ धो ले ।

नैवेद्य –

नैवेद्यको प्रोक्षित कर गन्ध-पुष्पसे आच्छादित करे । तदनन्तर जलसे चतुष्कोण घेरा लगाकर भगवानके आगे रखे ।

अमृतोपस्तरणमसि स्वाहा

प्राणाय स्वाहा

अपानाय स्वाहा

समानाय स्वाहा

उदानाय स्वाहा

व्यानाय स्वाहा

अमृतापिधानमसि स्वाहा

शर्कराखण्डखाद्यानि दधिक्षीरघृतानि

आहारं भक्ष्यभोज्यं नैवेद्यं प्रतिगृह्यताम्‌ ॥

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, नैवेद्य निवेदयामि

(नैवेद्य निवेदित करे ।)

‘नैवेद्यान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि’

(जल समर्पित करे ।)

ऋतुफल

याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश् पुष्पिणी

बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वहसः

इदं फलं मया देव स्थापितं पुरतस्तव

तेन मे सफलावाप्तिर्भवेज्जन्मनि जन्मनि

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, ऋतुफलानि समर्पयामि

(ऋतुफल अर्पित करे ।)

‘फलान्ते आचमनीयं जलं समर्पयामि

(आचमनीय जल अर्पित करे।)

उत्तरापोऽशन- ‘उत्तरापोऽशनार्थे जलं समर्पयामि गणेशाम्बिकाभ्यां नमः‘ ।

(जल दे।)

करोद्वर्तनः

अऽऽशुना ते अऽऽशुः पृच्यतां परुषा परुः

गन्धस्ते सोममवतु मदार रसो अच्युतः

चन्दनं मलयोद्भूतम् कस्तूर्यादिसमन्वितम्

करोद्‌वर्तनकं देव गृहाण परमेश्वर

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, करोद्वर्तन चन्दनं समर्पयामि

(मलयचन्दन समर्पित करे ।)

ताम्बूल

यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत

वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः

पुंगीफल महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम

एलादिचूर्णसंयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम्

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, मुखवासार्थम् एलालवंगपुंगीफलसहितं ताम्बूलं समर्पयामि

( इलायची, लौंग-सुपारी के साथ ताम्बूल (पान) अर्पित करे ।)

दक्षिणा

हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्

दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम

हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः

अनन्तपुण्यफलदमतः शान्तिं प्रयच्छ मे

भूर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, कृतायाः पूजायाः साद्गुण्यार्थे द्रव्यदक्षिणां समर्पयामि

(द्रव्य दक्षिणा समर्पित करे।)

आरती

इदंऽऽहविः प्रजननं मे अस्तु मसह्वीरऽऽसर्वगणऽऽस्वस्तये

आत्मसनि प्रजासनि पशुसनि लोकसन्यभयसनि

अग्निः प्रजां बहुलां मे करोत्वन्नं पयो रेतो असमासु धत्त्‌ ।

रात्रि पार्थिवऽऽ रजः पितुरप्रायि धामबिः

दिवः सदाऽऽसिबृहती वितिष्ठस त्वेषं वर्तते तमः

कदलीगर्मसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम्

आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव

भुर्भुवः स्वः गणेशाम्बिकाभ्यां नमः, आरार्तिकं समर्पयामि

(कर्पूरकी आरती करे, आरतीके बाद जल गिरा दे ।)

पुष्पांजलि

यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्

ते नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः

गणानां त्वा …………. ॥

अम्बे अम्बिके ……….. ॥

नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि

पुष्पाञ्जलिर्मया दत्ता गृहाण परमेश्वर

भुर्भुव स्वः गणेशाम्बिकाभ्या नमः, पुष्पाञ्जलि समर्पयामि

(पुष्पाञ्जलि अर्पित करे।)

अब गणेशजी का पूजन निम्न प्रकार से करें :

तीन बार जल के छींटें दें और बोलें : पाद्यं , अर्घ्यं , आचमनीयं समर्पयामि

सर्वाड्रेस्नानं समर्पयामि  जल के छींटे दें ।

सर्वाड्रे पंचामृतस्नानं समर्पयामि  पंचामृत से स्नान कराए ।

पंचामृतस्नानान्ते सर्वाड्रे शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि  शुद्ध जल से स्नान कराए ।

सुवासितम इत्रं समर्पयामि  इत्र चढाए ।

वस्त्रं समर्पयामि  वस्त्र अथवा मौली चढाए ।

यज्ञोपवीतं समर्पयामि  यज्ञोपवीत चढाए ।

आचमनीयं जलं समर्पयामि  जल के छींटे दें ।

गन्धं समर्पयामि  रोली अथवा लाल चन्दन चढाए ।

अक्षतान समर्पयामि  चावल चढाए ।

पुष्पाणि समर्पयामि  पुष्प चढाए ।

मंदारपुष्पाणि समर्पयामि  सफेद आक के फूल चढाए ।

शमीपत्राणि समर्पयामि  शमीपत्र चढाए ।

दूर्वांकुरान समर्पयामि  दूर्वा चढाए ।

सिंदूरं समर्पयामि  सिन्दूर चढाए ।

धूपम आघ्रापयामि  धूप करें ।

दीपकं दर्शयामि  दीपक दिखाए ।

नैवेद्यं समर्पयामि  प्रसाद चढाए ।

आचमनीयं जलं समर्पयामि  जल के छींटे दें ।

ताम्बूलं समर्पयामि  पान , सुपारी , इलायची आदि चढाए ।

नारिकेलफलं समर्पयामि  नारियल चढाए ।

ऋतुफलं समर्पयामि  ऋतुफल चढाए ।

दक्षिणां समर्पयामि  नकदी चढाए ।

कर्पूरनीराजनं समर्पयामि  कर्पूर से आरती करें ।

नमस्कारं समर्पयामि  नमस्कार करें ।

गणेश जी से प्रार्थना

पूजन के उपरान्त हाथ जोडकर इस प्रकार पार्थना करें :

विघ्नेश्वराय वरदाय सुरप्रियाय ,

लम्बोदराय सकलाय जगद्धिताय

नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय ,

गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते

भक्तार्तिनाशनपराय गणेश्वराय ,

सर्वेश्वराय शुभदाय सुरेश्वराय

विद्याधरायं विकटाय वामनाय ,

भक्तप्रसन्नवरदाय नमो नमस्ते

नमस्ते ब्रह्मरुपाय विष्णुरुपाय ते नमः

नमस्ते रुद्ररुपाय करिरुपाय ते नमः

विश्वस्वरुपरुपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे

लम्बोदरं नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रिय

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा

त्वां विघ्नशत्रुदलनेति सुन्दरेति

भक्तप्रियेति सुखदेति फलप्रदेति

विद्याप्रदेत्यघहरेति ये स्तुवन्ति

तैभ्यो गणेश वरदो भव नित्यमेव

अब हाथ में पुष्प लेकर निम्नलिखित मन्त्र को उच्चारित करते हुए समस्त पूजनकर्म भगवान गणेश को अर्पित कर दें :

गणेशपूजने कर्म यन्न्यूनमधिकं कृतम

तेन सर्वेण सर्वात्मा प्रसन्नोऽस्तु सदा मम

अनया पूजया सिद्धिबुद्धिसहितो

महागणपतिः प्रीयतां मम

शंख स्थापन एवं पूजन

उक्त पूजन के पश्चात चौकी पर दायीं ओर दक्षिणावर्ती शंख को थोडे से अक्षत डालकर स्थापित करना चाहिए । शंख का चन्दन अथवा रोली से पूजन करें । अक्षत चढाए तथा अन्त में पुष्प चढाए और निम्नलिखित मन्त्र की सहायता से प्रार्थना करें :

त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृतः करे

निर्मितः सर्वदेवैश्च पाञजन्य ! नमोऽस्तु ते

श्रीसूक्त लक्ष्मीपूजन – तृतीय पूजा

कलश स्थापन एवं पूजन

चौकी के पास ईशानकोण ( उत्तर -पूर्व ) में धान्य ( जौ -गेहु ) के ऊपर कलश स्थापित करें । अब हाथ में अक्षत एवं पुष्प लेकर कलश के ऊपर चारों वेद एवं अन्य देवी -देवताओं का निम्नलिखित मन्त्रों के द्वारा आवाहन करें :

कलशस्य मुखे विष्णुः कण्ठे रुद्रः समाश्रितः

मूले त्वस्य स्थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणाः स्मृताः

कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्धरा

ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेदः सामवेदो ह्यथर्वणः

अडैश्च सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः

अत्र गायत्री सावित्री शान्तिः पुष्टिकरी तथा

सर्वे समुद्राः सरितस्तीर्थानि जलदा नदाः

आयान्तु देवपूजार्थं दुरितक्षयकारकाः

गडे यमुने चैव गोदावरि सरस्वति

नर्मदे सिन्धुकावेरि जलेऽस्मिन सन्निधिं कुरु

उक्त आवाहन के पश्चात गन्ध , अक्षत , पुष्प आदि से कलश एवं उसमें स्थापित देवों का पूजन करें । तदुपरान्त सभी देवों को नमस्कार करें ।

कलश स्थापन एवं पूजन के उपरान्त नवग्रह एवं षोडशमातृका का पूजन यदि सम्भव हो सके , तो मण्डल बनाकर करें , अन्यथा नवग्रह एवं षोडशमातृका को चौकी पर स्थान देते हुए मानसिक पूजन कर लेना चाहिए ।

नवग्रह पूजन

दोनों हाथ जोडकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें और सूर्यादि नवग्रह देवताओं का ध्यान करें :

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी

भूमिसुतो बुधश्च

गुरुश्च शुक्रः शनिराहुकेतवः सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु

सूर्यः शौर्यमथेन्दुरुच्चपदवीं सन्मडलं मडलः

सदुद्धिं बुधो गुरुश्च गुरुतां शुक्रः सुखं शं शनिः

राहुर्बाहुबलं करोतु सततं केतुः कुलस्योन्नतिं

नित्यं प्रीतिकरा भवन्तु मम ते सर्वेऽनुकूला ग्रहाः

अपने हाथ में एक पुष्प लेकर उस पर कुंकुम लगाए और ‘ सूर्यादि नवग्रहदेवताभ्यो नमः कहते हूए सूर्य -चन्द्रमा आदि नवग्रहों एक निमित्त सामने चौकी पर चढा दें ।

अब सूर्य आदि ग्रहों को दीपकं दर्शयामि कहते हुए दीपक दिखाए और अपने हाथ धो लें । इसके पश्चात उन्हें नैवेद्य अर्पित करें । इसके पश्चात आचमन हेतु जल भी अर्पित करें ।

पंचलोकपाल पूजन

दोनों हाथ जोडकर निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करें और ब्रह्मादि पंचलोकपाल देवताओं का ध्यान करें :

ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः

बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च विवः

अपने हाथ में एक पुष्प लेकर उस पर कुंकुम लगाए और ब्रह्मादि पंचलोकपाल देवताभ्यो नमः कहते हुए ब्रह्मा आदि पंचलोकपालों के निमित्त सामने चौकी पर चढा दें ।

अब ब्रह्मा आदि पंचलोकपालों को दीपकं दर्शयामि कहते हुए दीपक दिखाए और अपने हाथ धो लें । इसके पश्चात उन्हें नैवेद्य अर्पित करें । इसके पश्चात आचमन हेतु जल भी अर्पित करें ।

दिक्पाल देवताओंकी स्थापना

नवग्रह मण्डलमें परिधिके बाहर पूर्वादि दसों दिशाओंके अधिपति देवताओं (दिक्पाल देवताओं) का अक्षत छोड़ते हुए आवाहन एवं
स्थापन करे ।

(पूर्वमें) इन्द्रका आवाहन और स्थापन –

त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र हवे हवे सुहव शूरमिन्द्रम्

ह्रयामि शक्रं पुरुहूतमिन्द्र स्वस्ति नो मघवा धात्विन्द्रः

इन्द्रं सुरपतिश्रेष्ठं वज्रहस्तं महाबलम्

आवाहये यज्ञसिद्ध्यै शतयज्ञाधिपं प्रभुम्

भूर्भुवः स्वः इन्द्र ! इहागच्छ, इह तिष्ठ इन्द्राय नमः, इन्द्रमावाहयामि, स्थापयामि

(अग्निकोणमें) अग्निका आवाहन और स्थापन –

अग्निं दूतं पुरो दधे हव्यवाहमुप ब्रुवे देवॉं२ सादयादिह

त्रिपादं सप्तहस्तं द्विमूर्धानं द्विनासिकम्

षण्नेत्रं चतुःश्रोत्रमग्निमावाहयाम्यहम्

भूर्भुवः स्वः अग्ने ! इहागच्छ, इह तिष्ठ अग्नये नमः, अग्निमावाहयामि, स्थापयामि

(दक्षिणमें) यमका आवाहन और स्थापन-

यमाय त्वाऽङ्गिरस्वते पितृमते स्वाहा स्वाहा घर्माय स्वाहा घर्मः पित्रे

महामहिषमारूढं दण्डहस्ते महाबलम्

यज्ञसंरक्षणार्थाय यममावहयाम्यहम्

भूर्भुवः स्वः यम ! इहागच्छ इह तिष्ठ यमाय नमः, यममावाहयामि, स्थापयामि

(नैऋत्यकोणमें) निऋतिका आवाहन और स्थापन-

असुन्वन्तमयजमानमिच्छ स्तेनस्येत्यामन्विहि तस्करस्य

अन्यमस्मदिच्छ सा इत्या नमो देवि निऋते तुभ्यमस्तु

सर्वप्रेताधिपं देवं निऋतिं नीलविग्रहम्

आवाहये यज्ञसिद्ध्यै नरारूढं वरप्रदम्

भूर्भुवः स्वः निऋते ! इहागच्छ, इह तिष्ठ निऋतये नमः, निऋतिमावाहयामि, स्थापयामि

(पश्चिममें) वरुणका आवाहन और स्थापन-

तत्त्वा यामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदा शास्ते यजमानो हविर्भिः

अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुश मान आयुः प्रमोषीः

शुद्धस्फटिकसंकाशं जलेशं यादसां पतिम्

आवाहये प्रतीचीशं वरुणं सर्वकामदम्

भूर्भुवः स्वः वरुण ! इहागच्छ, इह तिष्ठ वरुणाय नमः, वरुणमावाहयामि, स्थापयामि

(वायव्यकोणमें) वायुका आवाहन और स्थापन-

नो नियुद्भिः शतिनीभिरध्वर सहस्त्रिणीभिरुप याहि यज्ञम्

वायो अस्मिन्त्सवने मादयस्व सर्वतश्चारिणं शुभम्

यज्ञसंरक्षणार्थाय वायुमावाहयाम्यहम्

भूर्भुवः स्वः वायो ! इहागच्छ, इह तिष्ठ वायवे नमः, वायुमावाहयामि, स्थापयामि

(उत्तरमें) कुबेरका आवाहन और स्थापन-

कुविदङ्ग यवमन्तो यवं चिद्यथा दान्त्यनुपूर्वं वियूय

इहेहैषां कृणुहि भोजनानि ने बर्हिषो नम उक्तिं यजन्ति

उपयामगृहीतोऽस्यश्‍विभ्यां त्वा सरस्वत्यै त्वेन्द्राय त्वा सुत्राम्ण

एष ते योनिस्तेजसे त्वा वीर्याय त्वा बलाय त्वा

आवहयामि देवेशं धनदं यक्षपूजितम्

महाबलं दिव्यदेहं नरयानगतिं विभुम्

भूर्भुवः स्वः कुबेर ! इहागच्छ, इह तिष्ठ कुबेराय नमः, कुबेरमावाहयामि, स्थापयामि

(ईशानकोणमें) ईशानका आवाहन और स्थापन –

तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्

पूषा नो यथा वेदसाम्सद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये

सर्वाधिपं महादेवं भूतानां पतिमव्ययम्

आवाहये तमीशानं लोकानामभयप्रदम्

भूर्भुवः स्वः ईशान ! इहागच्छ, इह तिष्ठ ईशानाय नमः, ईशानमावाहयामि, स्थापयामि

(ईशानपूर्वके मध्यमें) ब्रह्माका आवाहन और स्थापन-

ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन आवः

बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश् योनिमसतश् वि वः

पद्मयोनिं चतुर्मूर्तिं वेदगर्भं पितामहम्

आवाहयामि ब्रह्माणं यज्ञसंसिद्धिहेतवे

भूर्भुवः स्वः ब्रह्मन् ! इहागच्छ, इह तिष्ठ ब्रह्मणे नमः, ब्रह्माणमावाहयामि, स्थापयामि

(नैऋत्यपश्चिमके मध्यमें) अनन्तका आवाहन और स्थापन-

स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी यच्छा नः शर्म सप्रथाः

अनन्तं सर्वनागानामधिपं विश्वरूपिणम्

जगतां शान्तिकर्तारं मण्डले स्थापयाम्यहम्

भूर्भुवः स्वः अनन्त ! इहागच्छ, इह तिष्ठ अनन्ताय नमः, अनन्तमावाहयामि, स्थापयामि

प्रतिष्ठा – इस प्रकार आवाहन कर

‘ॐ मनो०’

इस मन्त्रसे अक्षत छोड़ते हुए प्रतिष्ठा करे । तदनन्तर निम्नलिखित नाम-मन्त्रसे यथालब्धोपचार पूजन करे-

‘ॐ इन्द्रादिदशदिक्पालेभ्यो नमः ।’

इसके बाद

‘अनया पूजया इन्द्रादिदशदिक्पालाः प्रीयन्ताम्, मम’

ऐसा उच्चारण कर अक्षत मण्डलपर छोड़ दे ।

श्रीसूक्त लक्ष्मीपूजन – चतुर्थ पूजा

महालक्ष्मी पूजन

उक्त समस्त प्रक्रिया के पश्चात प्रधान पूजा में भगवती महालक्ष्मी का पूजन करना चाहिए । पूजा में अपने सम्मुख महालक्ष्मी का बडा चित्र अथवा लक्ष्मी -गणेश का पाना लगाना चाहिए । पूजन से पूर्व नवीन चित्र और श्रीयन्त्र तथा द्रव्यलक्ष्मी ( स्वर्ण अथवा चॉंदी के सिक्के ) आदि की निम्नलिखित मन्त्र से अक्षत छोडकर प्रतिष्ठा कर लेनी चाहिए :

अस्यै प्राणाः प्रतिष्ठन्तु अस्यै प्राणाः क्षरन्तु

अस्यै देवत्वमर्चायै मामहेति कश्चन

ध्यान

हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्त्रजाम

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो वह

महालक्ष्मै नमः ध्यानार्थे पुष्पं समर्पयामि

ध्यान हेतु मॉं लक्ष्मी को कमल अथवा गुलाब का पुष्प अर्पित करें ।

आवाहन

तां वह जातवेदो लक्ष्मीमनगामिनीम

यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्चं पुरुषानहम

कमलायै नमः कमलाम आवाहयामि , आवाहनार्थे पुष्पाणि समर्पयामि

मॉं लक्ष्मी का पूजन करने हेतु आवाहन करें और ऐसी भावना रखें कि मॉ लक्ष्मी साक्षात पूजन हेतु आपके सम्मुख आकर बैठी हों । आवाहन हेतु सामने चौकी पर पुष्प अर्पित करें ।

आसन

अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रमोदिनीम

श्रियं देवीमुप ह्रये श्रीर्मादेवी जुषताम

रमायै नमः आसनं समर्पयामि

आसनार्थे पुष्पं समर्पयामि

आसन हेतु सामने चौकी पर पुष्प अर्पित करें ।

पाद्य

कां सोमिस्तां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम

पद्मेस्थितां पद्मवर्णां तामिहोप ह्रये श्रियम

इन्दिरायै नमः इन्दिरां पादयोः पाद्यं समर्पयामि

मॉ लक्ष्मी को चन्दन आदि मिश्रित जल से पाद्य हेतु जल चढाए ।

अर्घ्य

चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम

तां पद्मिनीमीं शरणं प्र पद्ये अलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे

समुद्रतनयायै नमः समुद्रतनयां हस्तयोरर्घ्यं समर्पयामि

मॉं लक्ष्मी को सुगन्धित जल से अर्घ्य प्रदान करें ।

आचमन एवं पंचामृत

आदि से स्नान

आदित्यवर्णे तपसोऽधि जातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः

तस्य फलानि तपसा नुदन्तु या अन्तरा याश्च बाह्या अलक्ष्मीः

भृगुतनयायै नमः भृगुतनयाम आचमनीयं जलं समर्पयामि स्नानीयं जलं समर्पयामी पंचामृत स्नानं समर्पयामी

मॉं लक्ष्मी को आचमन हेतु जल चढाए एवं क्रमशः शुद्ध जल और पंचामृत से स्नान करवाए ।

वस्त्र

उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह

प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेस्मिन कीर्तिमृद्धिं ददातु मे

पद्मायै नमः पद्मां वस्त्रं समर्पयामी उपवस्त्रं समर्पयामी

मॉं लक्ष्मी को वस्त्र और उपवस्त्र चढाए ।

आभूषण

क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठालक्ष्मीं नाशयाम्यहम

अभूतिमसमृद्धिं सर्वां निर्णुद मे गृहात

कीर्त्यै नमः नानाविधानि कुण्डलकटकादीनि आभूषणानि समर्पयामि

मॉं लक्ष्मी को विभिन्न प्रकार के आभूषण अथवा तन्निमित्त अक्षत -पुष्प अर्पित करें ।

गन्धाक्षत , सिन्दूर एवं इत्र

गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम

ईश्वरीं सर्वभूतानां तामिहोप ह्रये श्रियम

आर्द्रायै नमः आर्द्रां गन्धं समर्पयामी

गन्धान्ते अक्षतान समर्पयामी

सिन्दूरं समर्पयामी

सुगन्धिद्रव्यं समर्पयामी

मॉं लक्ष्मी को क्रमशः गन्ध , अक्षत सिन्दूर एवं इत्र अर्पण करें ।

पुष्प एवं पुष्पमाला

मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि

पशूनां रुपमत्रस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः

अनपगामिन्यै नमः अनपगामिनीं पुष्पमालां समर्पयामि

मॉं लक्ष्मी को लाल रंग के पुष्प अर्पित करें ।

धूप

कर्दमेन प्रजा भूता मयि सम्भव कर्दम

श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम

महालक्ष्मै नमः धूपम आघ्रापयामि

गुग्गुल आदि की सुगन्धित धूप जलाकर मॉं लक्ष्मी की ओर धूप प्रसारित करें ।

दीप

आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे

नि देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले

श्रियै नमः श्रियं दीपकं दर्शयामि

चार बत्तियों वाला एक दीपक प्रज्वलित करें । मॉं लक्ष्मी को यह दीपक दिखाए ।

नैवेद्य

आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिडलां पद्ममालिनीम

चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो वह

अश्वपूर्वायै नमः अश्वपूर्वां नैवेद्यं निवेदयामि मध्ये पानीयम , उत्तरापोऽशनार्थं हस्तप्रक्षालनार्थं मुखप्रक्षालनार्थं जलं समर्पयामि ऋतुफलं समर्पयामि आचमनीयं जलं समर्पयामि

मॉं लक्ष्मी को क्रमशः नैवेद्य , आचमन , ऋतुफल तथा आचमन अर्पित करें ।

ताम्बूल

आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम

सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो वह

गन्धद्वारायै नमः गन्धद्वारां मुखवासार्थं ताम्बूलवीटिकां समर्पयामि

मॉं लक्ष्मी को मुखशुद्धि हेतु ताम्बूल अर्पित करें ।

दक्षिणा

तां वह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम

यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान विन्देयं पुरुषानहम

हिरण्यवर्णायै नमः हिरण्यवर्णां पूजा साफल्यार्थं दक्षिणां समर्पयामि

किए गये पूजन कर्म की पूर्ण सफलता के लिए मॉं लक्ष्मी को यथाशक्ति दक्षिणा अर्पित करें ।

अंग पूजन

अब निम्नलिखित मन्त्रों का पाठ करते हुए मॉं लक्ष्मी के निमित्त अंग पूजा करें । प्रत्येक मन्त्र को पढकर कुछ गन्धाक्षत -पुष्प सामने मण्डल पर चढाए ।

चपलायै नमः , पादौ पूजयामि

चञलायै नमः , जानुनी पूजयामि

कमलायै नमः , कटिं पूजयामि

कात्यायन्यै नमः , नाभिं पूजयामि

जगन्मात्रे नमः , जठरं पूजयामि

विश्ववल्लभायै नमः , वक्षःस्थलं पूजयामि

कमलवासिन्यै नमः , हस्तौ पूजयामि

पद्माननायै नमः , मुखं पूजयामि

कमलपत्राक्ष्यै नमः , नेत्रत्रयं पूजयामि

श्रियै नमः , शिरः पूजयामि

महालक्ष्म्यै नमः , सर्वाडं पूजयामि

श्रीसूक्त लक्ष्मीपूजन – पंचम पूजा

अष्टसिद्धि पूजन

अंगपूजन के पश्चात अष्टसिद्धियों का पूजन करें । पूजन में निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए गन्धाक्षत -पुष्प सामने मण्डल पर चढाए :

अणिम्ने नमः , महिम्ने नमः , गरिम्णे नमः , लघिम्ने नमः , प्राप्त्यै नमः , प्राकाम्यै नमः , ईशितायै नमः , वशितायै नमः

अष्टलक्ष्मी पूजन

अष्टसिद्धियों के पूजन के पश्चात मॉं लक्ष्मी के अष्ट स्वरुपों का पूजन करना चाहिए । निम्नलिखित मन्त्रों का उच्चारण करते हुए अष्टलक्ष्मियों के पूजन के लिए गन्धाक्षत -पुष्प सामने मण्डल पर चढाए :

आद्यलक्ष्म्यै नमः

विद्यालक्ष्म्यै नमः

सौभाग्यलक्ष्म्यै नमः

अमृतलक्ष्म्यै नमः

कामलक्ष्म्यै नमः

सत्यलक्ष्म्यै नमः

भोगलक्ष्म्यै नमः

योगलक्ष्म्यै नमः

आरती , पुष्पाज्जलि और प्रदक्षिणा

निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करते हुए जलपात्र लेकर आरती करें । आरती के पश्चात पुष्पांजलि एवं प्रदक्षिणा करें :

कदलीगर्भसम्भूतं कर्पूरं तु प्रदीपितम

आरार्तिकमहं कुर्वे पश्य मे वरदो भव

नानासुगन्धिपुष्पाणि यथाकालोद्भवानि

पुष्पाज्जलिर्मया दत्ता गृहाण परमेश्वरि

यानि कानि पापानि जन्मान्तरकृतानि

तानि सर्वाणि नश्यन्तु प्रदक्षिणा पदे पदे

महालक्ष्म्यै नमः प्रार्थनापूर्वकं नमस्कारान समर्पयामि

श्रीसूक्त लक्ष्मीपूजन – आरती तथा समर्पण

आरती तथा समर्पण

अब घर के सभी लोग एकत्र होकर मॉं लक्ष्मी की आरती करें । आरती के लिए एक थाली में रोली से स्वस्तिक बनाए । उस पर कुछ अक्षत और पुष्प डालकर गौघृत का चतुर्मुख दीपक स्थापित करें और मॉं लक्ष्मी की शंख , घंटी , डमरु आदि के साथ आरती करें । दीपक के पश्चात क्रमशः कर्पूर , धूप , जलशंख एवं वस्त्र की सहायता से आरती करें ।

जय लक्ष्मी माता , ( मैया ) जय लक्ष्मी माता

तुमको निशिदिन सेवत हर विष्णु धाता

उमा रमा ब्रह्माणी , तुम ही जग माता

सूर्य चन्द्रमा ध्यावत , नारद ऋषि गाता

दुर्गा रुप निरंजिनि , सुख सम्पति दाता

जो कोई तुमको ध्यावत , ऋधि सिधि धन पाता

तुम पाताल निवासिनी , तुम ही शुभदाता

कर्म प्रभाव प्रकाशिनी , भवनिधि की त्राता

जिस घर तुम रहती तह सब सदुण आता

सब सम्भव हो जाता , मन नहिं घबराता

तुम बिन यज्ञ होते , वस्त्र हो पाता

खान पान का वैभव सब तुमसे आता

शुभ गुण मन्दिर सुन्दर क्षीरोदधि जाता

रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहीं पाता

महालक्ष्मी जी की आरती , जो कोई नर गाता

उर आनन्द समाता , पाप उतर जाता

समर्पण : निम्नलिखित का उच्चारण करते हुए महालक्ष्मी के समक्ष पूजन कर्म को समर्पित करें और इस निमित्त जल अर्पित करें : कृतेनानेन पूजनेन भगवती महालक्ष्मीदेवी प्रीयताम मम

अब मॉं लक्ष्मी के समक्ष दण्डवत प्रणाम करें तथा अनजानें में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मॉंगते हुए , देवी से सुख -समृद्धि , आरोग्य तथा वैभव की कामना करें ।

दीपावली पर सरस्वती पूजन करने का भी विधान है । इसके लिए लक्ष्मी पूजन करने के पश्चात निम्नलिखित मन्त्रों से मॉं सरस्वती का भी पूजन करना चाहिए । सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्र से मॉं सरस्वती का ध्यान करें :

या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता ,

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना

या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता ,

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा

हाथ में लिए हुए अक्षतों को मॉं सरस्वती के चित्र के समक्ष चढा दें ।

अब मॉं सरस्वती का पूजन निम्नलिखित प्रकार से करें :

तीन बार जल के छींटे दें और बोलें : पाद्यं , अर्घ्यं , आचमनीयं

सर्वाडेस्नानं समर्पयामि  मॉं सरस्वती पर जल के छींटे दें ।

सर्वाडें पंचामृत स्नानं समर्पयामि । मॉं सरस्वती को पंचामृत से स्नान कराए ।

पंचामृतस्नानान्ते शुद्धोदक स्नानं समर्पयामि  शुद्ध जल से स्नान कराए ।

सुवासितम इत्रं समर्पयामि  मॉं सरस्वती पर इत्र चढाए ।

वस्त्रं समर्पयामि  मॉं सरस्वती पर मौली चढाए ।

आभूषणं समर्पयामि  मॉं सरस्वती पर आभूषण चढाए ।

गन्धं समर्पयामि  मॉं सरस्वती पर रोली अथवा लाल चन्दन चढाए ।

अक्षतान समर्पयामि  मॉं सरस्वती पर चावल चढाए ।

कुंकुमं समर्पयामि  मॉं सरस्वती पर कुंकुम चढाए ।

धूपम आघ्रापयामि  मॉं सरस्वती पर धूप करें ।

दीपकं दर्शयामि  मॉं सरस्वती को दीपक दिखाए ।

नैवेद्यं निवेदयामि  मॉं सरस्वती को प्रसाद चढाए ।

दीपावली पर सरस्वती पूजन

आचमनं समर्पयामि  मॉं सरस्वती पर जल के छींटे दें ।

ताम्बूलं समर्पयामि  मॉं सरस्वती पर पान , सुपारी , इलायची आदि चढाए ।

ऋतुफलं समर्पयामि  मॉं सरस्वती पर ऋतुफल चढाए ।

दक्षिणां समर्पयामि  मॉं सरस्वती की कर्पूर जलाकर आरती करें ।

नमस्कारं समर्पयामि  मॉं सरस्वती को नमस्कार करें ।

सरस्वती महाभागे देवि कमललोचने

विद्यारुपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोऽस्तुते

दीपावली पर कुबेर पूजन

दीपावली एवं धनत्रयोदशी पर महालक्ष्मी के पूजन के साथ -साथ धनाध्यक्ष कुबेर का पूजन भी किया जाता है । इनके पूजन से घर में स्थायी सम्पत्ति में वृद्धि होती है और धन का अभाव दूर होता है । इनका पूजन इस प्रकार करें ।

सर्वप्रथम निम्नलिखित मन्त्र के साथ इनका आवाहन करें :

आवाहयामि देव त्वामिहायामि कृपां कुरु

कोशं वर्द्धय नित्यं त्वं परिरक्ष सुरेश्वर

अब हाथ में अक्षत लेकर निम्नलिखित मंत्र से कुबेरजी का ध्यान करें :

मनुजवाह्यविमानवरस्थितं ,

गरुडरत्ननिभं निधिनायकम

शिवसखं मुकुटादिविभूषितं ,

वरगदे दधतं भज तुन्दिलम

हाथ में लिए हुए अक्षतों को कुबेरयंत्र , चित्र या विग्रह के समक्ष चढा दें ।

अब कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह का पूजन निम्नलिखित प्रकार से करें :

तीन बार जल के छींटे दें और बोलें : पाद्यं , अर्घ्य , आचमनीयं समर्पयामि

वैश्रवणाय नमः , स्नानार्थें जलं समर्पयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर जल के छींटे दें ।

वैश्रवणाय नमः , पंचामृतस्नानार्थे पंचामृतं समर्पयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह को पंचामृत स्नान कराए ।

वैश्रवणाय नमः , सुवासितम इत्रं समर्पयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर इत्र चढाए ।

वैश्रवणाय नमः , वस्त्रं समर्पयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर मौली चढाए ।

वैश्रवणाय नमः , गन्धं समर्पयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर रोली अथवा लाल चन्दन चढाए ।

वैश्रवणाय नमः , अक्षतान समर्पयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर चावल चढाए ।

वैश्रवणाय नमः , पुष्पं समर्पयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर पुष्प चढाए ।

वैश्रवणाय नमः , धूपम आघ्रापयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर धूप करें ।

वैश्रवणाय नमः , दीपकं दर्शयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह को दीपक दिखाए ।

वैश्रवणाय नमः , नैवेद्यं समर्पयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर प्रसाद चढाए ।

आचमनं समर्पयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर जल के छींटे दें ।

वैश्रवणाय नमः , ऋतुफलं समर्पयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर ऋतुफल चढाए ।

वैश्रवणाय नमः , ताम्बूलं समर्पयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर पान , सुपारी , इलायची आदि चढाए ।

वैश्रवणाय नमः , दक्षिणां समर्पयामि  कुबेर यंत्र , चित्र या विग्रह पर नकदी चढाए ।

वैश्रवणाय नमः , कर्पूरनीराजनं समर्पयामि  कर्पूर जलाकर आरती करें ।

वैश्रवणाय नमः , नमस्कारं समर्पयामि  नमस्कार करें ।

अंत में इस मंत्र से हाथ जोडकर प्रार्थना करें :

धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपाय

भगवन त्वत्प्रसादेन धनधान्यादिसम्पदः

कुबेर पूजन के साथ यदि तिजोरी की भी पूजा की जाए , तो साधक को दोगुना लाभ मिलता है ।

व्यापारीवर्ग के लिए दीपावली का दिन बही -खाता , तुला आदि के पूजन का दिवस भी होता है । सर्वप्रथम व्यापारिक प्रतिष्ठान के मुख्यद्वार के दोनों ओर दीवार पर शुभलाभ और स्वस्तिक एवं  सिन्दूर से अंकित करें । तदुपरान्त इन शुभ चिह्नों की रोली , पुष्प आदि से देहलीविनायकाय नमः कहते हुए पूजन करें । अब क्रमशः दवात , बहीखाता , तुला आदि का पूजन करना चाहिए ।

दवात पूजन : दवात को महाकाली का रुप माना गया है । सर्वप्रथम नई स्याहीयुक्त दवात को शुद्ध जल के छींटे देकर पवित्र कर लें , तदुपरान्त उसके मुख पर मौली बॉंध दे । दवात को चौकी पर थोडे से पुष्प और अक्षत डालकर स्थापित कर दें । दवात का रोली -पुष्प आदि से महाकाली के मन्त्र  श्रीमहाकाल्यै नमः के साथ पूजन करें । अन्त में इस प्रकार प्रार्थना करें :

कालिके ! त्वं जगन्मातर्मसिरुपेण वर्तसे

उत्पन्ना त्वं लोकानां व्यवहारप्रसिद्धये

लेखनी का पूजन : दीपावली के दिन नयी लेखनी अथवा पेन को शुद्ध जल से धोकर तथा उस पर मौली बॉंधकर लक्ष्मीपूजन की चौकी पर कुछ अक्षत एवं पुष्प डालकर स्थापित कर देना चाहिए । तदुपरान्त रोली पुष्प आदि से  लेखनीस्थायै देव्यै नमः मन्त्र बोलते हुए पूजन करें । तदुपरान्त निम्नलिखित मन्त्र से हाथ जोडकर प्रार्थना करें :

शास्त्राणां व्यवहाराणां विद्यानामाप्नुयाद्यतः

अतस्त्वां पूजयिष्यामि मम हस्ते स्थिरा भव ।‘’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’’ ॐ…………………………………………..

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